भोपाल : किसानों का महानायक किसान पुत्र मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने चौथी बार शपथ लेते ही कोरोना की संकटकालीन परिस्थितियों के मुकाबले के साथ अन्नदाता किसानों की सबसे पहले चिंता की। किसानों की फसल कट चुकी थी, 15 मार्च से समर्थन मूल्य पर खरीदी शुरू हो जाती थी। 23 मार्च को शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री की शपथ ली, तब-तक खरीदी प्रारंभ करने की कोई तैयारी नहीं थी। किसानों के माथे पर चिंता की लकीरे थी। कोविड-19 की भयावह तस्वीरों में किसान चिंतित थे कि इस बार उनका गेहूँ खरीदा भी जायेगा या नहीं। शपथ लेते ही मुख्यमंत्री ने समर्थन मूल्य पर गेहूँ खरीदी की प्रभावी तैयारियां की जिसके चलते प्रदेश में 15 अप्रैल से खरीदी प्रांरभ हुई। विपरीत परिस्थितियों में बेहतर तैयारियों और सतत मॉनिटरिंग से प्रदेश ने इस साल गेहूँ उपार्जन का ऑल टाईम रिकार्ड बनाया।

मध्यप्रदेश ने एतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए गेहूँ उपार्जन के मामले में देश के अग्रणी राज्य के रूप में नई पहचान स्थापित की है। मध्यप्रदेश के अन्नदाता किसानों ने मध्यप्रदेश को बनाया है। पंजाब जो परंपरागत रूप से गेहूँ उत्पादन और उपर्जन में देश में सबसे आगे होता था वो स्थान आज मध्यप्रदेश ने प्राप्त कर लिया है। इस वर्ष 129 लाख मीट्रिक टन से अधिक गेहूँ उपार्जन कर मध्यप्रदेश ने एक नया इतिहास रचा है।

उपार्जित गेहूँ के भुगतान की भी सरकार ने सुनिश्चित व्यवस्था की। अभी तक लगभग 25 हजार करोड़ से अधिक की राशि किसानों के खातों में पहुँच चुकी है। कोरोना और लॉकडाउन के चलते इस वर्ष गेहूँ उपार्जन कर किसानों को प्राथमिकता के आधार पर राशि दी गई। जिसमें ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को गति मिली। गेहूँ उपार्जन की प्रकिया में छोटे-छोटे भूखंड पर खेती करने वाले लघु और सीमांत किसानों को सबसे पहले सीधे लाभान्वित करने में सफलता मिली।

पिछली सरकार ने खरीफ और रबी फसलों के लिए फसल बीमा प्रीमियम की राशि 2200 करोड़ रूपयें का भुगतान बीमा कंपनियों को नहीं किया था। जिसके कारण किसानों को बीमा राशि नही मिल रही थी। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने बीमा राशि भुगतान करने का निर्णय लिया और इसके फलस्वरूप किसानों को 2900 करोड़ रूपये की बीमा राशि मिली। मध्यप्रदेश सरकार ने फसल कटाई के लिए भी व्यवस्थाएं सुनिश्चित की। जीरो प्रतिशत ब्याज पर किसानों को ऋण देने की योजना फिर शुरू की गई। चना, मूंग, उड़द की भी सरकारी खरीदी की गई। चने में 2 प्रतिशत तक तिवड़ा होने पर भी चने की खरीदी की गई। मध्यप्रदेश में चना, मसूर, सरसों प्रतिदिन प्रति व्यक्ति उपार्जन सीमा 40 क्विंटल को समाप्त कर दिया गया, इससे किसानों को इन फसलों की पूरी उपज समर्थन मूल्य पर बेचने की सुविधा मिली।

अब नए दौर में मध्यप्रदेश के किसान

कोरोना महामारी के संकटकाल में मध्यप्रदेश में किसानों को एक ऐसी सौगात दी गई, जिसका वे लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। कोरोना संकट के दौर में किसानों को आर्थिक परेशानियों से बचाने के लिए मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने एक ही झटके में मंडी अधिनियम में संशोधन करके किसानों को एक तरह से ग्लोबल मार्केटिंग से जोड़ने का करिश्मा कर दिखाया। आढ़त का काम कर रहे व्यापारियों को अगर लायसेंस राज से मुक्ति मिली है तो किसानों के लिए भी यह एक तरह से आर्थिक रूप से अपने को मजबूत बनाने का मौका कहा जा सकता है। कोरोना के इस संकट काल में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। देश में भी खेती और किसान आर्थिक विमर्श के केन्द्र में हैं। केन्द्र में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कृषि जिंसों की मार्केटिंग के लिए राज्य सरकारों को एक माडल एक्ट सौंप रखा है। इसके पीछे सरकार की मंशा है कि पूरे देश में कृषि जिंसों के लिए बाजार की एक जैसी व्यवस्था हो जाए ताकि किसानों को अपना उत्पादन बेचने के बेहतर विकल्प मिल सकें। राज्य की पिछली सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल रखा था। श्री चौहान को जब चौथी बार सरकार चलाने का मौका मिला है तो आपदा के इस दौर में उन्होंने किसानों के हित में मंडी एक्ट में संशोधन के साथ एक बड़ा किसान हितैषी कदम उठा लिया। मध्यप्रदेश देश का ऐसा पहला राज्य है जहां किसानों के हित में मण्डी एक्ट में संशोधन किया गया है।

मण्डी एक्ट में संशोधन का सीधा फायदा किसान को होगा। अब उसे अपने उत्पादन का ज्यादा से ज्यादा फायदा मिल सकता है। इसके लिए किसानों को अब मंडियों के चक्कर काटने की जरूरत भी नहीं होगी। मंडियों में किसानों को लंबे इंतजार के साथ अपनी उपज की गुणवत्ता को लेकर कई परेशानियों से दो-चार होना पड़ता था। मंडी अधिनियम में संशोधन के बाद अब किसान घर बैठ कर भी अपनी फसल निजी व्यापारियों को बेच सकेगा। जाहिर है कोरोना महामारी के इस दौर में सुरक्षा के जो मापदंड अपनाए जा रहे हैं, उसमें किसान की परेशानी कई गुना बढ़ना तय था। सरकार ने इस अधिनियम में संशोधन से पहले भी किसानों के हित में कुछ कदम उठाए थे लेकिन अब मंडी अधिनियम में जरूरी बदलावों के बाद किसान के लिए अपनी फसल बेचना पहले से ज्यादा आसान और फायदे का सौदा साबित होगा। मंडी में जाकर समर्थन मूल्य पर उपज बेचने का विकल्प किसान के पास जस का तस रहेगा। नई वैकल्पिक व्यवस्था बन जाने के बाद कृषि जिंसों के व्यापार में एक नई प्रतिस्पर्धा खड़ी होगी, जिसका फायदा किसानों को मिलेगा। लायसेंसी व्यापारी अब किसान के घर या खेत पर जाकर ही उसकी फसल खरीद सकेगा। एक ही लायसेंस से व्यापारी प्रदेश में कहीं भी जाकर यह खरीददारी कर सकेगा। इससे बिचौलियों की व्यवस्था खत्म होगी। मसलन भोपाल के एक व्यापारी को यदि पिपरिया जाकर अरहर दाल खरीदना होती थी तो उसे वहां के लायसेंसी व्यापारी के माध्यम से खरीददारी करना होती थी। अब यह बाध्यता खत्म होगी तो इसका सीधा फायदा किसान के अलावा उपभोक्ता को भी मिलेगा।

सरकार ने ई-टेंडरिंग का भी इंतजाम किया है। इसके तहत पूरे देश की मंडियों के दाम किसान को मिल जाएंगे। वो देश की किसी भी मंडी में, जहां उसे दाम ज्यादा मिल रहे हों, अपनी फसल का सौदा कर सकेगा। फल और सब्जियों को पहले ही प्रदेश में मंडी अधिनियम से छूट हासिल है। इसके अलावा मंडी शुल्क भी केवल एक बार की खरीदी बिक्री पर देना होता है। वैसे भी जब दुनिया भर में मुक्त बाजार की अवधारणा फल-फूल रही है तो किसानों को मंडियों के दायरे में बांधने का कोई मतलब नहीं रह जाता। लिहाजा मंडी अधिनियम में संशोधन, किसान को मुक्त व्यापार से जोड़ने की दिशा में सरकार का एक बड़ा कदम कहा जा सकता है। व्यवस्था में इस बदलाव का फायदा उत्पादक और उपभोक्ता दोनों को समान रूप से मिलने के आसार हैं। उदाहरण के लिए एक किसान अपने खेत पर आम दस या बीस रूपए किलो में एक व्यापारी को बेचता है लेकिन उपभोक्ता तक जाते-जाते इस आम की कीमत अस्सी या सौ रूपए किलो हो जाती है। नई व्यवस्था में किसानों से मंडी के बाहर उसके गांव से ही फूड प्रोसेसर, निर्यातक, होलसेल विक्रेता या फिर आखिरी उपयोगकर्ता सीधे किसान की उपज खरीद सकेगा। इसका एक मतलब यह होगा कि किसान अब अपने उत्पादन का व्यापारी भी खुद ही हो जाएगा।

मंडी अधिनियम में बदलाव के बाद अब गोदामों, साइलो कोल्ड स्टोरेज आदि को भी प्राइवेट मंडी माना जाएगा। मंडी समितियों का इन प्रायवेट मंडियों के काम में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं रहेगा। इसका एक फायदा यह भी होगा कि किसान के सामने भंडारण की जो समस्या हर फसल के सीजन में सामने खड़ी होती है, उसका समाधान एक तरह की गुंजाईश बनेंगी। अभी भंडारण की समस्या के कारण किसान अपनी उपज को लेकर हर समय एक तरह से आशंकाओं से ही घिरा रहता है। अधिनियम में संशोधन के बाद अब कम से कम ऐसा तो नहीं ही होगा कि उपज ज्यादा हो जाए, दाम गिर जाएं और किसान को उसे खेतों मे ही नष्ट करना पड़े। किसान की यह पीड़ा अब कम होगी। अब किसान से फूड प्रोसेसर सीधे उसकी फसल आसानी से खरीद सकेंगे। ऐसे में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को भी प्रदेश में बढ़ावा मिलता दिखेगा।

सरकार के इन फैसलों में यह साफ झलकता है कि मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह को न सिर्फ किसानों की चिंता है बल्कि एक किसान परिवार से होने के कारण किसानों की इन तकलीफों को भी वे बेहतर तरीके से जानते हैं। किसानों के हित में उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल में भी बहुत कुछ किया है। जीरो प्रतिशत ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराने के अलावा ब्याज पर सब्सिडी का मामला हो या फिर किसानों के हित में लाभकारी मूल्य देने जैसे कदम। मुझे लगता है कि एक किसान पुत्र होने के कारण किसानों की वास्तविक तकलीफों को श्री चौहान बेहतर तरीके से समझते हैं। सरकार के इस कदम ने किसानों के लिए आर्थिक मंदी के इस दौर में एक नया रास्ता खोल दिया है। किसान के लिए आज बाजार बड़ा और व्यापक होता दिख रहा है।