यात्रा बनाम यात्रा

आज कल प्रदेश में यात्राओं का दौर जोरों पर है। एक तरफ जन आशीर्वाद,तो दूसरी तरफ जन आक्रोश यात्रा! इन दोनों दलों की यात्रा की मंज़िल एक ही है,विधानसभा की गोलाकार इमारत। इन यात्राओं के बीच जनता ऐसे तमाशबीन है,जैसे किसी जुलूस को देखने भीड़ इकट्ठा होती है। एक तरफ सत्ता पक्ष की घोंषणाओं का बाज़ार गर्म है, तो दूसरी तरफ सत्ता की उम्मीद पाले कांग्रेसी उसमें अपने जन लुभावन वादों की फुहार डालने में लिप्त हैं। एक पक्ष अपने भ्रष्टाचार को धर्म व आध्यात्म की चादर से ढंकने का प्रयास करने में लगा है,तो विपक्ष उनके विभीषणों के माध्यम से लगातार उसे उघाड़ने का प्रयास कर रहा है। सत्तारूढ़ दल के तालाब के मेंढक लगातार विपक्ष के गड्ढे की तरफ छलांग लगाते नज़र आ रहे हैं। शायद उन्हें आभास हो चला है कि,सत्ता रूपी इस तालाब का पानी सूखने वाला है।