Sunday, 28 May 2017, 4:40 AM

उपदेश

दुराचारी का वध जरूरी

Updated on 9 January, 2015, 9:56
भौतिक दृष्टि से, प्रत्येक व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करना चाहता है और चाहता है कि ईश्वर उसके आज्ञापालक की तरह काम करें. किन्तु ईश्वर उनकी तृप्ति वहीं तक करते हैं जितने के वे पात्र होते हैं. किन्तु जब कोई इसके विपरीत मार्ग ग्रहण करता है अर्थात जब वह अपनी इन्द्रियों... आगे पढ़े

जैसी करनी वैसा फल

Updated on 8 January, 2015, 9:00
कर्मफल एक ऐसी सच्चाई है जिसे इच्छा या अनिच्छा से स्वीकारना ही होगा. यह समूची सृष्टि एक सुनियोजित व्यवस्था की श्रृंखला में जकड़ी हुई है. क्रिया की प्रतिक्रिया का नियम कण-कण पर लागू होता है और उसकी परिणति का प्रत्यक्ष दर्शन पग-पग पर होता है. कुछ कर्म तत्काल फल देते... आगे पढ़े

प्रेम की पवित्रता

Updated on 6 January, 2015, 13:06
इन दिनों प्राय: प्रेम का अर्थ लोभ, स्वार्थ, कामना और वासना से लगाया जाता है। यह कोई प्रेम नहीं है, यह तो कुछ पाने की इच्छा है और इच्छा तो अनंत होती है। इसकी पूर्ति संभव नहीं है, लेकिन प्रेम तो शुरू भी है और अंत भी। कहीं कोई विराम... आगे पढ़े

प्रेम किसी पर आश्रित नहीं

Updated on 4 January, 2015, 9:37
जब तुम किसी से जुड़े होते हो, आसक्त होते हो और दूसरा तुम्हारे साथ आसक्त होता है, तो तुम्हें लगता है कि इस अजनबी संसार में तुम अकेले नहीं हो. कोई तुम्हारे साथ है. किसी से संबंधित होने का यह भाव तुम्हें एक तरह की सुरक्षा देता है. जब मानवीय... आगे पढ़े

आत्मा और परमात्मा का संबंध

Updated on 2 January, 2015, 10:15
आधुनिक विज्ञानीजन तक जो आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते, पर साथ ही हृदय से शक्ति साधन की व्याख्या भी नहीं कर पाते, उन परिवर्तनों को स्वीकार करने को बाध्य हैं, जो बाल्यकाल से कौमारावस्था और फिर तरुणावस्था तथा वृद्धावस्था में होते रहते हैं. वृद्धावस्था से यही परिवर्तन दूसरे... आगे पढ़े

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